*ज़रूरी इत्तेला*
ख़ानक़ाहे चिश्तिया साग़रया अहमद नगरी क़स्बा संदीला में वाक़ए मदरसा मदीनतुल उलूम साग़रया निज़ामिया में बच्चों को क़ुरआन शरीफ़ की दीनी व इस्लामी तालीम कई सालों से दी जा रही है।जिसकी कोई फ़ीस ख़ानकाह की तरफ़ से नहीं ली जाती है यह मदरसा ग़रीब और ज़रूरतमंद परिवारों के बच्चों के लिए इल्म हासिल करने का अहम मरकज़ बना हुआ है। यहाँ न सिर्फ़ क़ुरआन की तिलावत और तजवीद सिखाई जाती है, बल्कि नमाज़,इस्लामी अख़लाक़, आदाब और बेहतर किरदार की तालीम भी दी जाती है, ताकि बच्चे एक अच्छे इंसान बन सकें।
मदरसे का पूरा खर्च ख़ानक़ाह से चलता है। किताबें, बिजली, पानी, तालीमी सामान और उस्ताद की फ़ीस सब कुछ ख़ानक़ाह व ख़ैरख़्वाह लोगों की मदद से पूरा होता है। आप भी इस नेक काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और सदक़ा-ए-जारीया का सवाब हासिल करें। आपकी छोटी सी मदद भी तालीम के इस पाक निज़ाम को आगे बढ़ाने और बच्चों के रोशन मुस्तकबिल की बुनियाद मजबूत करने में अहम किरदार अदा कर सकती है।
मिजानिब-ख़ानक़ाहे चिश्तिया साग़रया-सन्दीला
*रमज़ान में ज़कात व मदरसों की मदद की एहमियत*
रमज़ान का पाक महीना इबादत, सब्र और रहमत का महीना माना जाता है। इस मुकद्दस महीने में मुसलमान ज़्यादा से ज़्यादा नेक काम करने और ज़रूरतमंदों की मदद करने की कोशिश करते हैं। इन्हीं नेक कामों में सबसे अहम है ईमानदारी से ज़कात अदा करना। ज़कात इस्लाम के पाँच अरकान में से एक है और अल्लाह पाक ने मालदार मुसलमानों पर फ़र्ज़ किया है कि वे अपनी मालियत का तय हिस्सा ग़रीबों, मिस्कीनों और ज़रूरतमंदों तक पहुँचाएँ।
रमज़ान में ज़कात देने का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। इसी वजह से लोग इस महीने में अपनी ज़कात निकालकर समाज के कमज़ोर तबकों की मदद करते हैं। ज़कात के ज़रिये ग़रीब परिवारों को राशन, कपड़े, दवाइयाँ और बच्चों की तालीम का सहारा मिलता है। इससे समाज में बराबरी, मोहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम फैलता है।
मदरसे भी हमारी दीऩी तालीम के अहम मरकज़ हैं, जहाँ बच्चे क़ुरआन, हदीस और इस्लामी तालीम हासिल करते हैं। बहुत से मदरसे ज़कात और सदक़ात के सहारे ही चलते हैं। ऐसे में रमज़ान के महीने में मदरसों की मदद करना एक बड़ा सवाब का काम है। इससे न सिर्फ़ तालीम का सिलसिला जारी रहता है, बल्कि ग़रीब और यतीम बच्चों का भविष्य भी रोशन होता है।
हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इस रमज़ान में अपनी ज़कात सही हक़दार तक पहुँचाएँ और मदरसों की भी मदद करें, ताकि समाज में इल्म और इंसानियत का चराग़ यूँ ही रोशन रहता रहे।
मुईज़ साग़री चिश्ती

